उत्तराखंड  घूमने के लिए एक खूबसूरत पर्यटक स्थल है यहा कितनी ही ऐसी जगह है जहा जाकर आप सुख और शांति का अनुभव करेंगे आज ऐसे ही एक खूबसूरत जगह की मैं बात करना चाहता हु और वह जगह है मुक्तेश्वर (Mukteshwar) ।

मायानगरी मुंबई और नैनीताल जिले में स्थित शिव भगवान की नगरी मुक्तेश्वर में वैसे तो जमीन- आसमान का अंतर हैं, लेकिन कहा जाता है कि मुंबई का फैशन और मुक्तेश्वर का मौसम दिन भर में कई बार रूप बदलता है। एक नगरी समुद्र के तट पर है तो दूसरी समुद्र तल से 7500 फ़ीट की ऊंचाई पर है । इसी तरह मौसम और मौहब्बत की बात करे तो फिल्म सिंदूर में आंनद बक्शी के लिखे गीत ’पतझड़, सावन, बसंत बहार एक बरस में मौसम चार, पांचवां मौसम प्यार का’ और यहां के मौसम में कुछ अंतर है।

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1 5 अगस्त आजादी के दिन यहां पांचों मौसम देखने को मिले । लोगो का कहना है कि सावन में लगातार कई दिन तक लगने वाली झडी अब नहीं लगती। बीते शनिवार और रविवार को छुट्टी होने से बरसात में भी यहां के कारोबारियों और लोगों के चेहरे पर जहां चमक दिखी।

मुंबई , दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव से जाने वाले सैलानियों के लिए सेब के बगीचों में घूमना और उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले खास तरह के फूलों और देवदार के घने वन के बीच कुछ पल गुजारना सुकून देने वाला रहा ।

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प्रमुख पर्यटन स्थान चौली की जानी पहुंचकर कुदरत की गोद में अपनों के साथ सैल्की लेकर सैलानियों ने खूब लुल्फ उठाया, लेकिन बार-बार नेटवर्क गायब होने से वे मोबाइल फोन के जरिए अपनों को संदेश नहीं दे पाए । बता दें कि इन वादियों से सटे इस खूबसूरत स्थान पर किसना, बाज बर्ड इन डेंजर, सिर्फ तुम और मासूम फिल्मों को शूटिंग यहीं कीं गई है।

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उन्हें तब मायूसी हाथ लगी जब वे आसमान छूती हिमालयी चोटी नंदादेवी ( 26645 फ़ीट ) के साथ-साथ त्रिसूल
( 23 3 60 फीट), पंचाचूली ( 22 65 0 फ़ीट ) आदि को नग्न आंखों से नहीं देख सके।

कभी धूप, कभी छांव कभी बारिश तो कभी बादलों का आना-जाना इस कदर लगा रहा कि बर्फ से लदी धवल चोटियां देखना मुमकिन नहीं हो पाया । यहा कई जगह पर बने हिमालय व्यू पाइंट अभी शो पीस बने हैँ। बताया जाता है कि अक्टूबर-नवंबर से फरवरी-मार्च के बीच 450 किमी लंबी हिमालयी श्रृंखला यहा से साफ- साफ दिखती है ।

मुक्तेश्वर की कुछ ख़ास बाते

बताया जाता है कि शोध में मौसम की अनुकूलता के चलते ही ब्रिटिश शासनकाल में यहीं 3000 एकड़ में इम्पीरियल बैक्टेरिओलॉजिकल लैबोरेट्री क्री स्थापना को गई, जिसका नाम बदलकर 1925 में इम्पीरियल इंस्टीट्यूट आँफ वैटरीनऱी रिसर्च रखा गया । आजादी के बाद इसका नाम इंडियन बेटरीनऱी रिसर्च इंस्टीट्यूट रखा गया ।

उद्देश्य था कि पशुओं को संकामक बीमारियों से बचाकर उन्हें संरक्षित किया जाए । पर्वतीय पशुओं को संरक्षित करने और उनकी संख्या बढाने को भी जिम्मेदारी दी गई, लेकिन स्थानीय लोग इस बात से दुखी है कि इतना बड़ा राष्ट्रीय संस्थान होते हुए भी उनके पशुओं का समय पर इलाज नहीं हो पाता और न ही जरूरत के मुताबिक दवाये मिल पाती है ।

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उन्नत नस्ल की बकरियां पालना अब भी उनके लिए सपना ही है । दूसरी तरफ गांव के लोगो ने बताया की IVRI की वजह से ही यह की से ही यह की जैव विविधता और पर्यावरण सुरक्षित है । उनका कहना है कि शायद फल पट्टी में घट रहे पेड़-पौधे और तेजी से बन रहीं बहुमंजिली इमारतों की वजह से सावन कीं वो झडी अब नहीं लगती , जो लगातार कई दिनों तक बरसती थी ।

कुमाऊं में फल पट्टी के नाम से मशहूर रामगढ़ से मुत्तेठक्षर तक का इलाका, जिसे बाउल आँफ फ्रूट भी कहते हैँ। मौसम कीं मेहरबानी से इस बार सेब, नाशपाती, पुलम, आड़ू आदि खूब फलै-फूलै हैँ। यहा कभी फ्रीज रखने को जरूरत नहीं पड़ती, पर इतनी बड़ी फल पट्टी और आलू उत्पादन का क्षेत्र होते हुए भी कोई कोल्ड स्टोर नहीं होने से बागवान मायूस हैँ।

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